बेंगलुरु में हरियाली और स्वस्थ पर्यावरण बनाने की मुहिम
बूढ़े पेड़ों की रक्षा करने और उन्हें कील मुक्त बनाने में जुटी बेंगलुरु की हुडुगुरु टीम
चलते चलते अगर कभी पैर मे लोहे की कील चुभ जाए और ज़ख़्म बन जाए तो इंसान को बड़ा दर्द होता है। तो सोचिए अगर ऐसा हरे-भरे पेड़ों के साथ होता है तो उनके साथ क्या होता होगा? आज हम आप को एक अनूठी पहल के बारे मे बताएंगे जिसके तहत पेड़ों को कील मुक्त करना एक मिशन बनाया गया है। जी हां, बेंगलुरु के कुछ नागरिकों ने मिलकर 'बेंगलुरु हुडुगुरु' के नाम से एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है जिसके ज़रिये वे शहर के बूढ़े पेड़ों की रक्षा करने और उन्हें कील मुक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। इस समूह ने इस कार्य को अपना मिशन बना लिया है।
शहर की हरियाली और स्वस्थ पर्यावरण बनाने की मुहिम
बेंगलुरु शहर अपनी हरियाली के लिए गार्डन सिटी के नाम से भी जाना जाता है और यहां की हवा और इस मौसम ने इस शहर को पैराडाइज की पहचान दी है। इसे बनाए रखने और बूढ़े पेड़ों को बचाए रखने के लिए बेंगलुरु हुडुगुरु की टीम ने एक संकल्प बना लिया है। ये हर पेड़ पर ठोकी गई एक-एक कील को निकालने का काम करती है। ये टीम इस काम को हर वीक एंड पर करती है।
ऐसे आया था आइडिया
टीम की सदस्य कृति जोशी बताती हैं कि एक बार उन्हें पैर में कील चुभ जाने के कारण चोट लग गई थी, जिसे उन्होंने काफी समय तक इग्नोर किया था। आगे चलकर करीब तीन बार उन्हें अपने पैर का ऑपरेशन कराना पड़ा। वहीं से उन्हें यह विचार आया था कि जब इंसानों को कुछ चुभता है और उसका जहर फैल जाता है तो पेड़ों को कितना दर्द होता होगा। बस इसी के बाद से उन्होंने पेड़ों की यह पीड़ा दूर करने का जिम्मा उठा लिया।
एक-एक पेड़ से किलो के हिसाब से निकालते हैं लोहे की कील
हर वीक एंड पर बेंगलुरु हुडगुरु की टीम पेड़ों से प्रति किलो के हिसाब से लोहे की कील निकालने का काम कर रही है। हर एक पेड़ पर तकरीबन एक किलो से कम लोहा नहीं निकलता। फरदीन जो बॉक्सर हैं वे इस कार्य को अपना मोटिवेशन मानते हैं। वे हर वीक एंड पर इस कार्य को करने के लिए टीम के साथ अपने औज़ार लेकर निकल पड़ते हैं।
हुडुगुरु टीम के प्रयास से जागा प्रशासन
वहीं इस टीम के प्रयास को देखते हुए बेंगलुरु नगर पालिका ने भी यह फैसला कर लिया है कि पेड़ों को दर्द देने वाले लोगों को अब कानूनी सजा होगी। यानी जो पेड़ों को दर्द देंगे उन्हें दर्द का अहसास कराया जाएगा। यह बेहद जरूरी है कि हम पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की संवेदनाओं को समझें और आगे आएं।

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