Posts

Showing posts from January, 2021

शौक़ीनों के लिए सरकार की यह योजना बनी वरदान

उत्तराखंड घूमने के शौक़ीनों के लिए सरकार की यह योजना बनी वरदान, दिला रही खास सुविधा   अगर आप घूमने के शौक़ीन हैं, साथ ही किफायती दाम और लजीज़ व्यंजनों का लुत्फ उठाना चाहते हैं तो आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव साबित हो सकती है उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा चलाई जा रही शानदार योजना 'होम स्टे'। यहां पहाड़ों की शांत वादियों में घर जैसी सुविधाएं सुकून देती हैं और हरियाली व बर्फ से ढके पहाड़ों की रोमांचक जिंदगी आपको तरोताज़ा कर देती है।  पर्यटक, संस्कृति और पंरपराओं को मिलेगा बढ़ावा  पहाड़ी राज्य उत्तराखंड हमेशा से सैलानियों की पसंदीदा जगह रही है। जहां आस्था से लेकर रोमांच तक  कई तरह के अनुभव पर्यटकों को होते हैं। अभी तक पर्यटक होटलों और गेस्ट हाउसेज में ठहरते थे। लेकिन अब राज्य में चलाई जा रही योजना होम स्टे प्रयटकों को काफी लुभा रही है। यह योजना किफायती होने के साथ ही पर्यटक उत्तराखंड के लजीज व्यंजनों का भी आनंद ले सकते हैं। ये योजना अब दिनोंदिन देश-विदेश में भी लोकप्रिय होती जा रही है।  उत्तराखंड: दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास योजना    उत्तराखंड में 'दीनदयाल...

पैंगोंग झील का बदलता रहता है रंग, सर्दियों में ​जम जाती है झील

 पैंगोंग झील का बदलता रहता है रंग, नजारा देखने के लिए भारतीय सैलानियों को लेना होगा परमिट भारत-चीन के बीच हुए गतिरोध के वक्त पैंगोंग झील काफी सुर्खियों में रहा। अब उसी झील की खूबसूरती का नजारा देखने भारतीय सैलानी भी जा सकेंगे। हालांकि इस खूबसूरत झील का नजारा देखने के लिए पर्यटकों को ​​इनर लाइन परमिट लेना होगा। लद्दाख के पहाड़ों के बीच खारे पानी की इस सुंदर एंडोर्फिक झील का एक तिहाई क्षेत्र भारत में और बाकी हिस्सा तिब्बत के साथ चीन के इलाके में पड़ता है​​​​। एलएसी पर भारत और चीन के बीच गतिरोध की वजह बने विवादित क्षेत्रों में से सबसे प्रमुख पैंगोंग  ​​झील वास्तविक नियंत्रण की चीन-भारतीय लाइन पर पड़ती है।​ ​इसके लिए लेह लद्दाख के उपायुक्त ने ​​इनर लाइन परमिट ​लेने के लिए वेबसाइट ​​http://lahdclehpermit.in​ लांच की है​​​।​ इस पोर्टल पर जाकर भारतीय पर्यटक पैंगोंग झील ​जाने के लिए आवेदन कर सकते हैं​।    परमिट के लिए शर्तें   > कोरोना काल की वजह से कुछ शर्तें भी रखी गई हैं।  > सैलानियों को ​इनर लाइन परमिट​ मिलेगा जिनकी कोविड-19 ​परीक्षण रिपोर्ट 72 घंटे ​पहले त...

झारखंड की संपदा को संरक्षित कर रहे हीरामन

Image
झारखंड की संपदा को संरक्षित कर रहे हीरामन    झारखंड के गढ़वा जिले के दूरवर्ती सिंजो गांव निवासी हीरामन ने कोरवा भाषा को संरक्षित करने के उद्देश्य से एक शब्दकोश तैयार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2020 में मन की बात की अंतिम कड़ी में हीरामन के इन प्रयासों की प्रशंसा की थी। प्रधानमंत्री ने कहा था कि अपने समुदाय की संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए हीरामन ने 12 वर्षों के अथक परिश्रम के बाद कोरवा भाषा में शब्दकोश की रचना की है। उनका यह प्रयास पूरे देश के लिए मिसाल है।  हीरामन ने ऐसे तैयार किया कोरवा भाषा का यह शब्दकोश  भारतीय उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषायी समुदायों की बड़ी संख्या है। ये समुदाय आदिम काल से ही बदलते दौर के साथ सामंजस्य स्थापित कर भाषा एवं संस्कृति को संजोये हुए हैं। कोरवा भाषी हीरामन बचपन से ही अपनी भाषा को लेकर संवेदनशील रहे। वे कोरवा भाषा के शब्दों को डायरी में लिखते जाते। अब यही 50 पन्नों के शब्दकोश में परिवर्तित हो गया है। इस शब्दकोश में घर-गृहस्थी से जुड़े शब्दों से लेकर, अनाज, सब्जी, फल, पशु-पक्षी, रंग, दिन, महीना सहित अन्य कोरवा भाषा के शब्द...

बेंगलुरु में हरियाली और स्वस्थ पर्यावरण बनाने की मुहिम

Image
बूढ़े पेड़ों की रक्षा करने और उन्हें कील मुक्त बनाने में जुटी बेंगलुरु की हुडुगुरु टीम चलते चलते अगर कभी पैर मे लोहे की कील चुभ जाए और ज़ख़्म बन जाए तो इंसान को बड़ा दर्द होता है। तो सोचिए अगर ऐसा हरे-भरे पेड़ों के साथ होता है तो उनके साथ क्या होता होगा? आज हम आप को एक अनूठी पहल के बारे मे बताएंगे जिसके तहत पेड़ों को कील मुक्त करना एक मिशन बनाया गया है। जी हां, बेंगलुरु के कुछ नागरिकों ने मिलकर 'बेंगलुरु हुडुगुरु' के नाम से एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है जिसके ज़रिये वे शहर के बूढ़े पेड़ों की रक्षा करने और उन्हें कील मुक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। इस समूह ने इस कार्य को अपना मिशन बना लिया है। शहर की हरियाली और स्वस्थ पर्यावरण बनाने की मुहिम बेंगलुरु शहर अपनी हरियाली के लिए गार्डन सिटी के नाम से भी जाना जाता है और यहां की हवा और इस मौसम ने इस शहर को पैराडाइज की पहचान दी है। इसे बनाए रखने और बूढ़े पेड़ों को बचाए रखने के लिए बेंगलुरु हुडुगुरु की टीम ने एक संकल्प बना लिया है। ये हर पेड़ पर ठोकी गई एक-एक कील को निकालने का काम करती है। ये टीम इस काम को हर वीक एंड पर करती है। ऐसे आ...

जानें अब तक कितनी बार बिना मुख्य अतिथि के मनाया जा चुका है गणतंत्र दिवस

Image
जानें अब तक कितनी बार बिना मुख्य अतिथि के मनाया जा चुका है गणतंत्र दिवस        ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का आगामी गणतंत्र दिवस में शामिल होने का कार्यक्रम रद्द हो गया है। प्रधानमंत्री जॉनसन ने प्रधानमंत्री मोदी को फोन कर इसकी जानकारी दी और इस पर खेद जताया। अब इस गणतंत्र दिवस पर अब मुख्य अतिथि के तौर पर कौन शामिल होंगे, इसको लेकर सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक बयान नहीं आया है। दौरा रद्द किए जाने को लेकर प्रधानमंत्री जॉनसन ने टेलीफ़ोन पर पीएम मोदी से की बात प्रधानमंत्री जॉनसन ने टेलीफ़ोन पर प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि सोमवार रात घोषित राष्ट्रीय लॉकडाउन और नये कोरोना वायरस संस्करण के तेजी से फैलाव को देखते हुए उनका ब्रिटेन में रहना महत्वपूर्ण है। इससे वह वायरस पर घरेलू प्रतिक्रिया पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि प्रधानमंत्री जॉनसन ने आज सुबह प्रधानमंत्री मोदी से बात की। उन्होंने इस महीने के अंत में भारत दौरे पर आने में असमर्थता जाहिर करते हुए खेद व्यक्त किया। अगले छह महीने के बीच...

असम का एक ऐसा मंदिर जहां छह महीने ही होती है पूजा-अर्चना

Image
 असम का एक मंदिर ऐसा जहां छह महीने ही होती है पूजा-अर्चना दुनिया भर के मंदिरों में सुबह तड़के प्रार्थना शुरू हो जाती है और शाम की आरती नियमित रूप से होती है, जिसमें लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। एक मंदिर ऐसा भी है जहां साल में केवल छह महीने ही पूजा-अर्चना होती है। हम बत कर रहे हैं असम के काशी बिश्वनाथ मंदिर की।  दूसरे काशी के रूप में प्रसिद्ध बिश्वनाथ जिले के गुप्त काशी बिश्वनाथ घाट का एक ऐतिहासिक विशेष मंदिर है। इस मंदिर में सिर्फ छह महीने ही लोग पूजा-अर्चना करते हैं। यह देवालय छह महीने सूखा और छह महीने पानी के नीचे रहता है। 27 ऐतिहासिक मंदिरों में से एक   असम के इतिहास में 27 प्रसिद्ध मंदिरों में से यह भी एक प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर को बिश्वनाथ गोहाईं या पानी बिश्वनाथ के नाम से जाना जाता है। बरसात आरंभ होते ही यह मंदिर पूरी तरह ब्रह्मपुत्र के पानी में डूब जाता है। बाढ़ के जाने के बाद लोग इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। सूखे के समय अस्थायी रूप से मंदिर को बनाया जाता है। इतिहासकारों की मानें तो 16वीं शताब्दी से लोग इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए...